महाविद्यालय कुलगीत

अज्ञान तिमिर हरने को प्रतिपल, तत्पर विद्या भवन हमारा ।
बहा रहा है ज्ञान, प्रेम और सौहार्द की अविरल धारा ॥
तमस कलुष धुल जाता है,
ज्ञान की अमृत धारा में ।
नया क्षितिज मिल जाता है,
नित नूतन श्रम की धारा में ।
यहाँ की पावन धरती पर, हर पल ढलता व्यक्तित्व हमारा ॥
बहा रहा है.... .... .... ..... .... ....
राम- रहीम की पावनता से,
नित नूतन सजे चरित्र हमारा,
त्रिधारायें अभिषेक कर रहीं,
ऐसा है सौभाग्य हमारा ।
सुरभित है आदर्शों से, पर्यावरण यहाँ सारा ॥
बहा रहा है.... .... .... ..... .... ....
जीवन मूल्यों का श्रृंगार यहाँ,
नव ज्ञान की जयकार यहाँ ।
घने द्रुमों की शीतल छाया,
स्वर्णिम किरण वितान यहाँ ।
ज्योति जलाकर विद्या की, भव सागर मिले किनारा ।
बहा रहा है.... .... .... ..... .... ....
कण-कण यहाँ का गीत गाता,
त्याग का बलिदान का ।
हर सबेरा संदेश लाता,
मानवता के त्राण का ।
देशोन्नति में रहे समर्पित, यही रहा है लक्ष्य हमारा ।
बहा रहा है ज्ञान, प्रेम और सौहार्द की अविरल धारा ॥